बहुजनों के मसीहा, महानायक, सामाजिक क्रांतिकारी महान त्यागी, बहुजनों के मार्ग दर्शक और वैज्ञानिक से बने समाजिकक विज्ञानी मान्यवर साहब कांशीराम जी के त्याग और संघर्ष भरे जीवन की दास्तान हम आपके साथ सांझा कर रहे हैं..![]()
टी. आर. खुटे जी कांशीराम जी के करीबी साथियों में से एक रहे हैं। अगस्त 1980 के किसी रोज कांशी राम जी पहली बार खुंटे जी के साथ ‘छिंद’ नामक जगह पर लगते ‘रामनवमी’ के मेले में गए थे। तीन दिन के इस मेले में महापुरुषों की तस्वीरों की प्रदर्शनी लगाई गई थी। छत्तीसगढ़ (36 आदिवासी राजाओं की भूमि) एक ऐसा राज्य है जहाँ उच्च जाति के लोग 5 प्रतिशत हैं। लेकिन यहाँ जो लोग उच्च जाति की भूमिका निभाने वाले हैं वे खुद ही ओबीसी जाति के लोग हैं, जिसके चलते वे साहेब के साथ नहीं जुड़ सके। 16 प्रतिशत लोग यहाँ शेड्यूल्ड कास्ट हैं। एसटी लोगों की आबादी 32 प्रतिशत है।
साहेब यहाँ पूरे तन-मन के साथ लगे हुए थे। लेकिन जब जांजगीर लोकसभा (1984) से उन्हें मात्र 32 हजार वोट ही मिले तो उन्होंने अपना ज्यादा समय उत्तर प्रदेश को देना शुरू कर दिया। जब बसपा दिन-प्रतिदिन हर चुनाव में लीड करने लग गई तब साहब को लगने लगा कि एक बढ़िया शुरुआत के लिए उत्तर प्रदेश की राजनीतिक जमीन उपजाऊ है, न कि छत्तीसगढ़ की। 1989 में उत्तर प्रदेश से बहन कुमारी मायावती जी सांसद बन गई। फिर साहेब भी 1991 में इटावा से सांसद बन गए। 1993 में सपा और बसपा की साझी सरकार बन गई और 1995 में बहन मायावती जी मुख्यमंत्री भी बन गई। जब कि साहेब 1988 तक छत्तीसगढ़ में संघर्ष करते रहे लेकिन कुछ ख़ास परिणाम हाथ नहीं लगे।
इन सभी समीकरणों को देखते हुए साहेब अक्सर यह कह देते थे कि अच्छा हुआ मैं उत्तर प्रदेश चला गया, वर्ना छत्तीसगढ़ के लोग वही मेरा मकबरा बना देते। वे लोग खुद तो घुटने के बल बैठे ही हैं, और अगर मैं उत्तर प्रदेश न जाता तो इन्होंने मुझे भी घुटनों पर ला खड़ा करना था।
साहेब के साथी रहे उदिल किरण के मुताबिक छत्तीसगढ़ की ऐसी कोई भी सड़क नहीं है, जहाँ साहेब कांशी राम के कदम न पड़े हों।
वोट का अधिकार हमें बिकने के लिए नहीं बल्कि गुलामी से मुक्ति के लिए मिला है- साहेब कांशी राम।
हमारे रहबरों (महापुरूषों)की सोंच और बहुजन विचारधारा को घर-घर तक पहुंचाने की जिम्मेदारी हमारी-आपकी सबकी है।
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