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SUMMARY:भारतीय बौद्ध महासभा (The Buddhist Society of India) (04 मई\, 1955)
DESCRIPTION:  \nभारतीय बौद्ध महासभा (The Buddhist Society of India)\n(04 मई\, 1955)\n🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 \nभारतीय बौद्ध महासभा (The Buddhist Society of India) भारत के बौद्धों का एक राष्ट्रीय संगठन है। बाबा साहब डॉ.भीमराव आम्बेडकर जी ने आज ही के दिन 04 मई\, 1955 को मुंबई\, महाराष्ट्र में इसकी स्थापना की थी। मई\, 1955 को बॉम्बे के ‘नरे पार्क’ में आयोजित एक समारोह में बाबा साहब ने बौद्ध धम्म के प्रचार के लिए इस संगठन की स्थापना की औपचारिक घोषणा की थी। इसका मुख्यालय मुंबई में है। वर्तमान में इसके राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में बाबा साहब के परपोते राजरत्न आंबेडकर जी कार्य कर रहे हैं। भारतीय बौद्ध महासभा\, अंतर्राष्ट्रीय बौद्ध संगठन “वर्ल्ड फैलोशिप ऑफ बुद्धिस्ट्स” का सदस्य भी है। इससे कई भारतीय राज्यों के बौद्ध अनुयायी सदस्य के रूप में जुडे हुए हैं। “द वर्ल्ड फैलोशिप ऑफ बुद्धिस्ट्स” (डब्ल्यू.एफ.बी.-विश्व बौद्ध सम्मेलन) एक अंतरराष्ट्रीय बौद्ध संगठन है। इसे गुनापाला पियासेना माललसेकेरा द्वारा शुरू किया गया\, इसकी स्थापना वर्ष 1950 में कोलंबो\, सिलोन में 27 देशों के प्रतिनिधियों द्वारा की गई थी। थेरावादी बौद्ध अनुयायी इस संगठन में प्रभावशाली हैं\, इसका मुख्यालय थाईलैंड में है और इसके सभी अध्यक्ष श्रीलंका या दक्षिण पूर्व एशिया से हैं। सभी बौद्ध संप्रदायों के सदस्य डब्लू.एफ.बी. में सक्रिय हैं। परंपरागत बौद्ध देशों के अलावा अब भारत\, संयुक्त राज्य अमेरिका\, ऑस्ट्रेलिया\, अफ्रीका और यूरोप के कई देशों सहित 35 देशों में इसके क्षेत्रीय केंद्र हैं। वर्तमान में फैलोशिप के अध्यक्ष के रूप में 1999 से थाईलैंड के फैन वन्नमेटी की सेवा कर रहे हैं\, जबकि चीन गणराज्य के हिंग युन मानद अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं।\nबुद्धिस्ट सोसाइटी ऑफ इंडिया एक धाम्मिक सार्वजनिक ट्रस्ट है\, जिसकी स्थापना बोधिसत्व भारत रत्न बाबासाहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी ने वर्ष 1954 में की थी और इसे 04 मई\, 1955 को भारतीय सोसायटी पंजीकरण अधिनियम\, 1860 के तहत पंजीकरण संख्या 3227 के तहत पंजीकृत कराया था। बाद में\, आवश्यकताओं के अनुसार इसे बॉम्बे पब्लिक ट्रस्ट एक्ट\, 1950 (अब महाराष्ट्र पब्लिक ट्रस्ट एक्ट\, 1950) के तहत पंजीकरण संख्या F-982 (बीओएम) दिनांक 06 जुलाई\, 1977 के तहत पंजीकृत किया गया था। इसका मुख्य उद्देश्य भारत और विदेशों में भगवान बुद्ध की सामाजिक और नैतिक शिक्षाओं का प्रसार करना है। भारतीय बौद्ध महासभा की स्थापना की जड़ें वर्ष 1954 में आयोजित बौद्ध विश्व फैलोशिप के पहले सम्मेलन में निहित हैं\, जिसका मुख्यालय अब थाईलैंड-बैंकॉक में है।\nभारतीय बौद्ध महासभा थाईलैंड\, बैंकॉक की विश्व फैलोशिप के क्षेत्रीय केंद्रों में से एक है\, यह विश्व बौद्ध विश्वविद्यालय\, बौद्ध सेमिनार और बौद्ध स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली की स्थापना पर काम कर रही है। \nभारतीय बौद्ध महासभा (The Buddhist Society of India) के स्थापना दिवस 04 मई के सुअवसर पर आप सभी को हार्दिक मंगल कामनाएं तथा The Buddhist Society of India के संस्थापक व बौद्ध धम्म को भारत भूमि पर पुनः गति प्रदान करने वाले युगपुरूष बोधिसत्व बाबा साहब डॉ.भीमराव आंबेडकर जी को कृतज्ञतापूर्ण नमन 💐🙏
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SUMMARY:प्रखर बौद्ध विद्वान "अयोति थास"
DESCRIPTION:प्रखर बौद्ध विद्वान “अयोति थास”\n(20 मई\, 1845 – 05 मई\, 1914) \n  \n \n🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 \nप्रखर बौद्ध विद्वान अयोति थास जी का जन्म चेन्नई के रोयापेट्टा में एक बहुजन परिवार में 20 मई\, 1845 को हुआ था। वह एक प्रसिद्ध चिकित्सक और तमिल विद्वान थे\, जिन्हें ज्योतिष और ताड़ के पत्तों की पांडुलिपि पढ़ने के पारंपरिक ज्ञान में विद्वतापूर्ण विशेषज्ञता हासिल थी।  वर्ष 1870 में\, अयोति थास जी\nने उथगमंडलम में\, जहां उनका पालन-पोषण हुआ था\, अद्वैधानंद सभा की स्थापना की। (यह उनके जीवन में पहली संस्था निर्माण की गतिविधि मानी जाती है)  वर्ष 1891 में उन्होंने द्रविड़ महाजन सभा नाम के एक संगठन की स्थापना की और 01 दिसंबर\, 1891 को उन्होंने नीलगिरी जिले के ऊटी में इस महाजन सभा की ओर से पहला सम्मेलन आयोजित किया\, उस सम्मेलन में उन्होंने दस प्रस्ताव पारित किए गए थे\, जिसमें अछूतों को परिया कहकर अपमानित करने वालों को दंडित करने के लिए एक आपराधिक कानून बनाने\, अलग स्कूल बनाने और अछूत बच्चों के लिए मैट्रिक की शिक्षा के लिए छात्रवृत्ति प्रदान करने तथा जाति व्यवस्था को खत्म करने के लिए दलितों को बौद्ध धर्म अपनाने के लिए प्रेरित करना प्रमुख था। इस उद्देश्य से उन्होंने तमिल साहित्य और तमिल की लोक परम्पराओं की सहायता से एक वैकल्पिक इतिहास की रचना की। उन्होंने प्रदर्शित किया कि अछूत ही मूल निवासी बौद्ध थे और उन पर अस्पृश्यता थोपी गई थी। उन्होंने जातिवादी अमानवीय लोगों द्वारा प्रचलित की गयी रूढ़िवादी प्रथाओं का विरोध खुलकर किया था। उन्होंने जोर देकर कहा कि बौद्ध धम्म ही भारत के इतिहास में पहला मानवीय आंदोलन था। इसलिए उन्होंने दलितों से अपने मूल धम्म\, बौद्ध धम्म की ओर लौट आने का आह्वान किया। वर्ष 1898 में\, अयोति थास ने पंचमा स्कूल के हेड मास्टर कृष्णासामी के साथ सीलोन (श्री लंका) का दौरा किया और वहां उन्होंने खुद को बौद्ध धम्म में परिवर्तित कराया। वर्ष 1898 में कर्नल (ओल्काट) ने मद्रास के पंचमा समुदाय के प्रतिनिधि के रूप में पंडित अयोति थास को सीलोन ले गए थे\, जिन्हें महायाजक सुमंगला द्वारा बौद्ध धम्म में प्रवेश दिया गया और इस तरह दक्षिण भारत के बौद्ध प्रचार के इतिहास में बहुजनों द्वारा एक नए युग की शुरुआत की गई। बौद्ध धम्म अपनाने के बाद उन्होंने जल्द ही वर्ष 1898 में रॉयपेट्टा\, मद्रास में ‘द शाक्य बुद्धिस्ट सोसाइटी’ की स्थापना की और वर्ष 1907 में उन्होंने इस सोसाइटी के एक अंग के रूप में अपनी पत्रिका “ओरु पैसा तमिलन” की शुरूआत की तथा वर्ष 1907 से लेकर 05 मई\, 1914 तक उनकी सभी सामाजिक और धाम्मिक गतिविधियों को इस पत्रिका में दर्ज किया गया था। द शाक्य बुद्धिस्ट सोसाइटी ने प्रत्येक शाम को ‘बुद्ध धम्म पीरसंगम’ (बौद्ध धम्म के सिद्धांतों का प्रचार) बौद्ध धम्म पर नियमित व्याख्यान आयोजित करना शुरू कर दिया। यह व्याख्यान आधी रात तक चलते थे।इससे कई बुद्धिजीवियों ने अयोति थास के नेतृत्व में बौद्ध धम्म के सिद्धांतों को समाज फैलाने के लिए खुद को समर्पित कर दिया था और लोग बौद्ध अनुष्ठानों\, समारोहों और उत्सवों में बड़ी संख्या में लेने लगे। इससे बहुजनों का सांस्कृतिक जीवन बौद्ध होने लगा और जन्म\, विवाह तथा अंत्येष्टि के जीवन की घटनाओं में बौद्ध रीति-रिवाजों का प्रचलन प्रारंभ होने लगा साथ ही बौद्ध धम्म अपनाने वालों के नाम भी तमिलन पत्रिका में 24 अगस्त\, 1912 को प्रकाशित हुए थे। अयोति थास ने बहुजनों से उस दौर में प्रबल आह्वान किया कि वह अपने धर्म को बौद्ध धम्म के रूप में अभिलेखों-दस्तावेजों में दर्ज करायें। आज ही के दिन 05 मई\, 1914 को दक्षिण भारत के महान बौद्ध प्रचारक व बुद्ध धम्म की आधार भूमि निर्मित करने वाले महान विचारक अयोति थास जी का निधन हो गया था।\nजिस तरह महाराष्ट्र में बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर जी की वैचारिकी की पृष्ठभूमि एवं आधार महामना ज्योतिबा फुले जी के विचारों ने खड़ा किया था\, उसी तरह पेरियार ई.वी. रामासामी जी नायकर की वैचारिकी की पृष्ठभूमि एवं आधार का निर्माण तमिलनाडु में अयोति थास जी ने ही किया था। अंतर है तो सिर्फ सामाजिक पृष्ठभूमि का\, जहां महामना ज्योतिबा फुले जी बहुजन समाज की माली जाति (सछूत) में जन्म लिये\, वहीं पंडित अयोति थास जी बहुजन समाज की परियाह जाति(अछूत) में जन्में थे। अयोति थास जी ने बोधिसत्व बाबा साहब डॉ.भीमराव आंबेडकर जी द्वारा बौद्ध धम्म ग्रहण करने से करीब 50 वर्ष पूर्व बौद्ध धम्म ग्रहण कर लिया था। वर्ष 1901 की पहली जनगणना के समय अयोथी थास ने बहुजनों से आह्वान किया था कि वह खुद को जातिविहीन आदि द्रविड़ के रूप में जनगणना में दर्ज कराएं। दस वर्षों बाद वर्ष 1911 की जनगणना के समय उन्होंने पुन: इस मांग और आह्वान को बहुजनों और ब्रिटिश सरकार के मध्य दोहराया। इसके अतिरिक्त उन्होंने तत्कालीन ब्रिटिश सरकार से भी यह मांग किया कि वह बहुजनों को मूल बौद्धिस्ट के रूप में ही सूचीबद्ध करें\, भले ही ‘अछूत’ अपनी उप-जातियां भी जनगणना में दर्ज काराएं। अयोति थास जी किसी भी रूप में आदि द्रविड़ों को बौद्ध से अलग किसी अन्य प्रचलित धर्म का\, मानने के लिए तैयार नहीं थे। बहुजन मुक्ति आंदोलन के प्रणेता अयोति थास जी ने तत्कालीन ब्रिटिश सत्ता के आगमन से पैदा हुए नए अवसरों का भी समाज हित में भरपूर इस्तेमाल किया और न्याय\, समता\, अवसर\, स्वतंत्रता एवं बंधुत्व पर आधारित राष्ट्र निर्माण के लिए अपना पूरा जीवन अर्पित कर दिया।\nआधुनिक बुद्धिज़्म के प्रवर्तक\, ‘बुद्धिज़्म सामाजिक राजनैतिक क्रांति का मानवीय एवं नैतिक दर्शन है\, पूजा पद्धति नही’\, का सम्यक उदघोष करने वाले\, अनेको विहारों-शिक्षण एवं प्रशिक्षण शालाओं-धम्म संस्थाओ के निर्माता\, ‘बहुजन ही बुद्ध एवं असोक के बुद्धिस्ट वंशज हैं’-जैसी अनेक युगांतकारी प्रतिस्थापनायें करने वाले\, नागपुर\, हैदराबाद\, बंगलौर\, पूना अफ्रीका\, बर्मा आदि में धम्म का सम्यक प्रचार-प्रसार व अपने पुत्र राजाराम को अफ्रीका में धम्म-प्रचार के लिए भेजने वाले\, महान बुद्धिवादी\, वैज्ञानिक\, तार्किक\, द्रविड़ियन आन्दोलन के जनक\, महिलाओं के लिए सम्मान-सम्पति के अधिकार के प्रबल समर्थक\, अनागरिक धम्मपाल\, प्रोफेसर नरसू\, मुरुगेसम\, सी.गुरुसामी\, स्वनेश्वरी अम्माल\, रत्तामाली श्रीनिवासन\, अन्नादुरई\, पेरियार के गुरु\, पहली आधुनिक बौद्ध संस्था-‘शाक्य बुद्धिस्ट सोसाइटी’ (1898) के संस्थापक\, पाली\, अंग्रेजी\, तमिल तथा संस्कृत के महान ज्ञाता\, सिद्ध चिकित्सा के विशेषज्ञ\, उच्च-कोटि के दार्शनिक\, मौलिक-चिंतन एवं लेखन के धनी\, निर्भीक व निष्पक्ष पत्रकार (‘तमिलान’- वर्ष 1907 से 1914 तक)\, नीलगिरी हिल्स में आदिवासी समाज के संगठन कर्ता\, महान शिक्षाविद\, अनेकों स्कूलों के निर्माता\, अद्भुत संगठनकर्ता\, महान सामाजिक क्रान्तिकारी अयोति थास जी के स्मृति दिवस 05 मई पर कृतज्ञतापूर्ण नमन
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SUMMARY:भिक्षु जगदीश काश्यप (02 मई\, 1908-28 जनवरी\, 1976)
DESCRIPTION:🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸🌸 \nभारत में बिहार प्रदेश के आधुनिक इतिहास में बौद्ध दर्शन के पुनरुद्धार का श्रेय जिस एक व्यक्तित्व को जाना चाहिए वे हैं भिक्षु जगदीश काश्यप। यह दुर्भाग्य ही है कि इन महान व्यक्तित्व के नाम से ज्यादातर लोग अपरिचित ही हैं। त्रिपिटक व पाली के प्रकाशित ग्रंथों को देवनागरी में रूपांतरित करने का महान प्रयत्न काश्यप जी ने ही किया था। पाली बौद्ध ग्रंथों के देवनागरी रूपांतरण\, संपादन\, मुद्रण आदि के लिए उन्होंने अपना पूरा जीवन लगा दिया।\nउन्होंने आल इंडिया भिक्खु संघ की स्थापना की थी तथा राजगीर में जापान पैगोडा के विकास में योगदान और ह्वेनसॉंग संग्रहालय की स्थापना में महत्वपूर्ण योगदान दिया। नव नालंदा महाविहार\, जिसे सामान्य तौर से पालि इंस्टीट्यूट के रूप में जाना जाता है\, भिक्षु जगदीश काश्यप के प्रयत्नों का ही प्रतिफल है। आज एक बार फिर नालंदा में विश्व स्तर के विश्वविद्यालय की स्थापना की कोशिश है। यदि यह हुआ तो इसे काश्यप जी के सपनों का साकार होना ही कहेंगे।\nभिक्षु जगदीश काश्यप का जन्म रांची में आज ही के दिन 02 मई\, 1908 को हुआ था। इनके बचपन का पूरा नाम जगदीश नारायण था। जब वह राहुल सांकृत्यायन से मिले\, तो उनकी मेधा से बहुत प्रभावित हुए। काश्यप जी राहुल जी के द्वारा बुद्ध से कुछ-कुछ परिचित हो चुके थे। काश्यप जी बौद्ध धम्म दर्शन और खासकर पाली भाषा के अध्ययन के लिए उत्सुक हुए। उस समय पाली त्रिपिटक के अध्ययन का सबसे बड़ा केंद्र सिरी लंका का विद्यालंकार महाविहार था। काश्यप जी ने विद्यालंकाराधिपति को पत्र लिखा और वहां आने की अनुमति मांगी। उनके वहां जाने का मार्ग प्रशस्त किया राहुल सांकृत्यायन जी ने। राहुल जी ने काश्यप जी को पत्र देकर सिरी लंका विदा किया। सिरी लंका में जगदीश नारायण ने धम्म की प्रव्रज्या ग्रहण कर ली और जगदीश नारायण से जगदीश काश्यप हो गए। कहते हैं जगदीश नारायण ने मां और अन्य पारिवारिक सदस्यों से इस प्रवज्या के लिए अनुमति ली थी। काश्यप जी ने कठिन परिश्रम से जल्दी ही त्रिपिटाकाचार्य में विशेषज्ञता प्राप्त कर ली। पाली भाषा पर अधिकार प्राप्त कर इन्होंने श्रीलंका मे बौद्ध धर्म की स्थिति का अध्ययन किया और संस्कृत में इस विषय पर एक पुस्तक लिखी। वहां के विद्वानों के बीच इनकी काफी प्रतिष्ठा हो चुकी थी। राहुल जी भी इन पर नजर रखे हुए थे। वर्ष 1934 में काश्यप जी जब भारत लौटे तो राहुल जी इन्हें साथ लेकर जापान चले गए। पूरब के अनेक बौद्ध देशों में घूमकर दोनों विद्वानों ने अपना ज्ञान बढ़ाया। इस यात्रा में काश्यप जी ने चीनी भाषा सीख ली और दीघनिकाय का अनुवाद कार्य पूरा लिया। इसके साथ-साथ बौद्धों के ध्यानयोग जिसे विपस्यना कहते हैं\, में काश्यप जी ने निपुणता प्राप्त कर ली। उन पर ज्यादा-से-ज्यादा काम करने की धुन सवार थी। जल्दी ही उन्होंने प्रमुख बौद्धग्रंथ मिलिन्दपन्हों का भी हिंदी में अनुवाद कर दिया। भारत लौटने पर काश्यप जी ने सारनाथ को अपना कार्यक्षेत्र बनाया। उस समय वहां अनेक बौद्ध विद्वान रहते थे। यहीं पर इन्होंने प्रकांड विद्वान धम्मानंद कोसाम्बी से अभिधम्म और विसुद्धिमग्ग जैसे ग्रंथों का अध्ययन किया। उनकी विद्वता की चारों ओर प्रतिष्ठा हो रही थी\, किन्तु काश्यप जी को थोथे विद्वान बना रहना स्वीकार नहीं था। बौद्ध धम्म को लेकर एक सांस्कृतिक आंदोलन की बात उनके मन में थी और वह एक सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में काम करना चाहते थे। उनके मन में यह भी था कि उनके अपने बिहार प्रांत में ही बौद्ध धम्म की कोई चर्चा नहीं है। बोधगया का महाविहार भी तब जर्जर हाल में था। लोगों में बुद्ध धम्म का कोई प्रचार नहीं था। यह सब सोचकर काश्यप जी ने वाराणसी से मगध क्षेत्र में आकर बस गए। अब वह गांव-गांव घूमते। मगही भाषा में लोगों को बुद्ध व उनके विचारों के बारे में बतलाते और कोई न कोई केंद्र अथवा कुटी बनाने का प्रयास करते। इसी बीच वह नालंदा में आकर बस गये। वहां उन्होंने नालंदा कालेज में पाली के अध्ययन की व्यवस्था की। वहां जब कोई शिक्षक न मिला\, तो वह स्वयं शिक्षक बन गए। इसी बीच तत्कालीन शिक्षा सचिव जगदीशचंद्र माथुर से मिलकर उन्हें नालंदा में एक अंतर्राष्ट्रीय स्तर का पाली अध्ययन संस्थान खोलने के लिए राजी कर लिया। इसके बाद वह स्वयं नालंदा में आकर संभावनाओं की तलाश करने लगे। सैकड़ों लोगों से इन्होंने मुलाकात की। वह भी ऐसे कार्य के लिए जिसे लोग अभी जानते तक नहीं थे कि पाली और त्रिपिटक क्या चीज है। इसी क्रम में वे इस्लामपुर के मुस्लिम जमींदार से भी मिले और उनसे कहा कि आपके पूर्वजों ने भी कभी नालंदा को जलाया था\, मैं आपसे उसे फिर से बसाने के लिए दान मांगने आया हूं। वह मुस्लिम जमींदार काश्यप जी से बहुत प्रभावित हुए और तुरंत ग्यारह एकड़ जमीन पाली संस्थान के लिए काश्यप जी को दान में दे दिया। इसी जमीन पर दिनांक 20 नवंबर\, 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डा. राजेन्द्र प्रसाद जी ने नव नालंदा विहार की आधारशिला रखी थी। नव नालंदा महाविहार काश्यप जी की ही देन है। इसे खड़ा कर उन्होंने एक बार फिर बिहार में बौद्ध धम्म के अध्ययन-अध्यापन की शुरुआत कर दी थी। आज यह संस्थान उनकी कीर्ति के रूप में खड़ा है और बार-बार हमें उस प्राचीन विश्वविश्रुत नालंदा विश्वविद्यालय की याद दिलाता है। उस महाविहार की स्थापना के बाद काश्यप जी का ध्यान लुप्त पाली वांड्मय की ओर गया। संपूर्ण पाली वांड्मय कई विदेशी लिपियों में तो था\, किंतु अभी तक नागरी लिपि में था ही नहीं। पाली टेक्स्ट सोसाइटी लंदन ने सिंहली से रोमन लिपि में पाली वांड्मय का अनुवाद कराया था। इस अनुवाद से नागरी लिपि में अनुवाद करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य था। जगदीश काश्यप जी ने इस महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करके दिखाया। संपूर्ण पालि वांड्मय आज इकतालीस खंडों में नागरी लिपि में उपलब्ध है। राज्य और केन्द्र सरकार से निवेदन कर इसके प्रकाशन की भी व्यवस्था काश्यप जी ने करायी थी। यह एक ऐसा कार्य है\, जिसके लिए उन्हें बौद्ध जगत में सदैव याद रखा जाएगा। काश्यप जी का नाम राहुल सांकृत्यायन और भदंत आनंद कौशल्यायन के साथ आधुनिक भारत में बौद्ध धम्म के उन्नायकों में लिया जाता है। तीनों बौद्ध विद्वान मिलकर एक त्रयी बनाते हैं। इन तीनों ने मिलकर महान बौद्ध भिक्खु अनागरिक धम्मपाल जी के मिशन को पूरा किया। आधुनिक काल में भिक्षु-त्रयों में से एक जगदीश कश्यप का योगदान अतुलनीय रहा है। बौद्ध धम्म को उसकी जड़ों तक पुनर्स्थापित कराने और बिहार के लोगों को इस स्थान के प्राचीन गौरव से पुनः परिचित कराने में भिक्खु जगदीश कश्यप के योगदान का कोई सानी नहीं है। उनके द्वारा नालन्दा के पुरावशेषों महाविहार की स्थापना का कार्य आज बौद्ध शिक्षा का एक प्रमुख केन्द्र बनकर उभरा है। आज फिर देश और बिहार प्रदेश में बौद्ध धम्म की चर्चा है। इस चर्चा के बीच भिक्खु जगदीश काश्यप जी का स्मरण तालाब के जलतंरगों के बीच शुभ्रकमल की तरह खिलता प्रतीत होता है। आने वाले समय में जब बिहार प्रदेश और प्रबुद्ध होगा तब काश्यप जी के महत्व को हम और गंभीरता से समझ सकेंगे। मधुमेह से पीड़ित होने के कारण\, वह वर्ष 1974 में गंभीर रूप से बीमार हो गए और अपने अंतिम दो वर्ष बिहार में राजगीर के जापानी मंदिर में बिस्तर पर बिताए \, जहां से वह गिद्ध-शिखर और नवनिर्मित पीस-पैगोडा देख सकते थे। दिनांक 28 जनवरी\, 1976 को राजगृह में ही भिक्खु काश्यप जी का निधन हो गया। नालंदा में ही उनकी अंत्येष्टि हुई थी। आज नव नालंदा महाविहार के प्रांगण में उनकी स्फटिक प्रतिमा लगी है। कभी मगध के ही एक भिक्खु शीलभद्र ने नालंदा की कीर्ति में चार चांद लगाया था। मगध के इस आधुनिक भिक्खु ने भिक्खु महाकश्यप और शीलभद्र की परंपरा को इस जमाने तक खींच लाने में अहम योगदान दिया था। \nआधुनिक इतिहास में बौद्ध दर्शन के पुनरुद्धारक रहे महा विद्वान भिक्खु जगदीश काश्यप जी के जन्म दिवस 02 मई पर उन्हें कृतज्ञतापूर्ण नमन💐🙏
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SUMMARY:महानायक क्रांतिवीर मातादीन हेला जन्मदिवस
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